श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.63

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

इत्युक्तो गुरुरप्याह कुपितो याह्यलं त्वया।

विप्रावमन्त्रा शिष्येण मदधीतं त्यजाश्‍विति॥ ६३

ityukto gururapyāha kupito yāhyalaṃ tvayā|

viprāvamantrā śiṣyeṇa madadhītaṃ tyajāśviti|| 63

अर्थ

याज्ञवल्क्यमुनिकी यह बात सुनकर वैशम्पायनमुनिको क्रोध आ गया। उन्होंने कहा—‘बस-बस’, चुप रहो। तुम्हारे-जैसे ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाले शिष्यकी मुझे कोई आवश्यकता नहीं है। देखो, अबतक तुमने मुझसे जो कुछ अध्ययन किया है उसका शीघ्र-से-शीघ्र त्याग कर दो और यहाँसे चले जाओ॥ ६३॥

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