श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.68

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

यदु ह वाव विबुधर्षभ सवितरदस्तपत्यनुसवनमहरहराम्‍नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरितवृजिनबीजावभर्जन भगवतः समभिधीमहि तपनमण्डलम्॥ ६८॥ य इह वाव स्थिरचरनिकराणां निजनिकेतनानां मनइन्द्रियासुगणाननात्मनः स्वयमात्मान्तर्यामी प्रचोदयति॥ ६९॥ य एवेमं लोकमतिकरालवदनान्धकारसंज्ञाजगरग्रहगिलितं मृतकमिव विचेतनमवलोक्यानुकम्पया परमकारुणिक ईक्षयैवोत्थाप्याहरहरनुसवनं श्रेयसि स्वधर्माख्यात्मावस्थाने प्रवर्तयत्यवनिपतिरिवासाधूनां भयमुदीरयन्‍नटति॥ ७०॥ परित आशापालैस्तत्र तत्र कमलकोशाञ्जलिभिरुपहृतार्हणः॥ ७१॥ अथ ह भगवंस्तव चरणनलिनयुगलं त्रिभुवनगुरुभिर्वन्दितमहमयातयामयजुःकाम उपसरामीति॥ ७२॥ ✎ 976 1546 1547 1548 1549 1550 1551 1552 1553 1554 1555 1556

yadu ha vāva vibudharṣabha savitaradastapatyanusavanamaharaharāmnāyavidhinopatiṣṭhamānānāmakhiladuritavṛjinabījāvabharjana bhagavataḥ samabhidhīmahi tapanamaṇḍalam|| 68||

अर्थ

प्रभो! आप समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। जो लोग प्रतिदिन तीनों समय वेद-विधिसे आपकी उपासना करते हैं, उनके सारे पाप और दुःखोंके बीजोंको आप भस्म कर देते हैं। सूर्यदेव! आप सारी सृष्टिके मूल कारण एवं समस्त ऐश्‍वर्योंके स्वामी हैं। इसलिये हम आपके इस तेजोमय मण्डलका पूरी एकाग्रताके साथ ध्यान करते हैं॥ ६८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (12)
  • #976 शब्दोंके बीचका स्थान: यदुह → यदु ह
  • #1546 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: त्रिभुवनगुरुभिर्वन्दितमहमयातयाम- यजु:काम → त्रिभुवनगुरुभिर्वन्दितमहमयातयामयजुःकाम
  • #1547 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: चरण- नलिनयुगलं → चरणनलिनयुगलं
  • #1548 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कमलकोशाञ्जलिभि- रुपहृतार्हण:॥ → कमलकोशाञ्जलिभिरुपहृतार्हणः॥
  • #1549 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रवर्तय-त्यवनिपतिरिवासाधूनां → प्रवर्तयत्यवनिपतिरिवासाधूनां
  • #1550 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ईक्षयैवोत्थाप्याहरह-रनुसवनं → ईक्षयैवोत्थाप्याहरहरनुसवनं
  • #1551 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विचेतनमवलोक्यानु-कम्पया → विचेतनमवलोक्यानुकम्पया
  • #1552 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: लोकमतिकरालवदनान्धकारसंज्ञाजगर-ग्रहगिलितं → लोकमतिकरालवदनान्धकारसंज्ञाजगरग्रहगिलितं
  • #1553 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मनइन्द्रियासुगणा-ननात्मन: → मनइन्द्रियासुगणाननात्मनः
  • #1554 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्थिरचर-निकराणां → स्थिरचरनिकराणां
  • #1555 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सवितरदस्तपत्यनुसवन-महरहराम्‍नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरित-वृजिनबीजावभर्जन → सवितरदस्तपत्यनुसवन-महरहराम्‍नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरितवृजिनबीजावभर्जन
  • #1556 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सवितरदस्तपत्यनुसवन-महरहराम्‍नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरितवृजिनबीजावभर्जन → सवितरदस्तपत्यनुसवनमहरहराम्‍नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरितवृजिनबीजावभर्जन

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