॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.6.73
सूत उवाच
एवं स्तुतः स भगवान् वाजिरूपधरो हरिः।
यजूंष्ययातयामानि मुनयेऽदात् प्रसादितः॥ ७३
evaṃ stutaḥ sa bhagavān vājirūpadharo hariḥ|
yajūṃṣyayātayāmāni munaye'dāt prasāditaḥ|| 73
अर्थ
सूतजी कहते हैं—शौकनादि ऋषियो! जब याज्ञवल्क्यमुनिने भगवान् सूर्यकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे प्रसन्न होकर उनके सामने अश्वरूपसे प्रकट हुए और उन्हें यजुर्वेदके उन मन्त्रोंका उपदेश किया, जो अबतक किसीको प्राप्त न हुए थे॥ ७३॥