श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.7.21

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

विरमेत यदा चित्तं हित्वा वृत्तित्रयं स्वयम्।

योगेन वा तदाऽऽत्मानं वेदेहाया निवर्तते॥ २१

virameta yadā cittaṃ hitvā vṛttitrayaṃ svayam|

yogena vā tadā''tmānaṃ vedehāyā nivartate|| 21

अर्थ

जब चित्त स्वयं आत्मविचार अथवा योगाभ्यासके द्वारा सत्त्वगुण-रजोगुण-तमोगुण-सम्बन्धी व्यावहारिक वृत्तियों और जाग्रत्-स्वप्न आदि स्वाभाविक वृत्तियोंका त्याग करके उपराम हो जाता है, तब शान्तवृत्तिमें ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्योंके द्वारा आत्मज्ञानका उदय होता है। उस समय आत्मवेत्ता पुरुष अविद्याजनित कर्म-वासना और कर्मप्रवृत्तिसे निवृत्त हो जाता है॥ २१॥

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