शौनकजीने कहा—साधुशिरोमणि सूतजी! आप आयुष्मान् हों। सचमुच आप वक्ताओंके सिरमौर हैं। जो लोग संसारके अपार अन्धकारमें भूल-भटक रहे हैं, उन्हें आप वहाँसे निकालकर प्रकाशस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करा देते हैं। आप कृपा करके हमारे एक प्रश्नका उत्तर दीजिये॥ १॥
सूत जीव चिरं साधो वद नो वदतां वर।
तमस्यपारे भ्रमतां नृणां त्वं पारदर्शनः॥ १
शौनकजीने कहा—साधुशिरोमणि सूतजी! आप आयुष्मान् हों। सचमुच आप वक्ताओंके सिरमौर हैं। जो लोग संसारके अपार अन्धकारमें भूल-भटक रहे हैं, उन्हें आप वहाँसे निकालकर प्रकाशस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करा देते हैं। आप कृपा करके हमारे एक प्रश्नका उत्तर दीजिये॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.8.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 946) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/8/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1242 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां