श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.1

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अथाष्टमोऽध्यायः

मार्कण्डेयजीकी तपस्या और वर-प्राप्ति

शौनक उवाच

सूत जीव चिरं साधो वद नो वदतां वर।

तमस्यपारे भ्रमतां नृणां त्वं पारदर्शनः॥ १✎ 1242

sūta jīva ciraṃ sādho vada no vadatāṃ vara|

tamasyapāre bhramatāṃ nṛṇāṃ tvaṃ pāradarśanaḥ|| 1

अर्थ

शौनकजीने कहा—साधुशिरोमणि सूतजी! आप आयुष्मान् हों। सचमुच आप वक्ताओंके सिरमौर हैं। जो लोग संसारके अपार अन्धकारमें भूल-भटक रहे हैं, उन्हें आप वहाँसे निकालकर प्रकाशस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करा देते हैं। आप कृपा करके हमारे एक प्रश्‍नका उत्तर दीजिये॥ १॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1242 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां

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