श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.32

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तस्यैवं युंजतश्‍चित्तं तपःस्वाध्यायसंयमैः।

अनुग्रहायाविरासीन्‍नरनारायणो हरिः॥ ३२

tasyaivaṃ yuṃjataścittaṃ tapaḥsvādhyāyasaṃyamaiḥ|

anugrahāyāvirāsīnnaranārāyaṇo hariḥ|| 32

अर्थ

शौनकजी! मार्कण्डेय मुनि तपस्या, स्वाध्याय, धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा भगवान्‌में चित्त लगानेका प्रयत्‍न करते रहते थे। अब उनपर कृपाप्रसादकी वर्षा करनेके लिये मुनिजन-नयन-मनोहारी नरोत्तम नर और भगवान् नारायण प्रकट हुए॥ ३२॥

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