॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.8.32
तस्यैवं युंजतश्चित्तं तपःस्वाध्यायसंयमैः।
अनुग्रहायाविरासीन्नरनारायणो हरिः॥ ३२
tasyaivaṃ yuṃjataścittaṃ tapaḥsvādhyāyasaṃyamaiḥ|
anugrahāyāvirāsīnnaranārāyaṇo hariḥ|| 32
अर्थ
शौनकजी! मार्कण्डेय मुनि तपस्या, स्वाध्याय, धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा भगवान्में चित्त लगानेका प्रयत्न करते रहते थे। अब उनपर कृपाप्रसादकी वर्षा करनेके लिये मुनिजन-नयन-मनोहारी नरोत्तम नर और भगवान् नारायण प्रकट हुए॥ ३२॥