श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.35

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

ते वै भगवतो रूपे नरनारायणावृषी।

दृष्ट्वोत्थायादरेणोच्चैर्ननामांगेन दण्डवत्॥ ३५

te vai bhagavato rūpe naranārāyaṇāvṛṣī|

dṛṣṭvotthāyādareṇoccairnanāmāṃgena daṇḍavat|| 35

अर्थ

जब मार्कण्डेय मुनिने देखा कि भगवान्‌के साक्षात् स्वरूप नर-नारायण ऋषि पधारे हैं, तब वे बड़े आदरभावसे उठकर खड़े हो गये और धरतीपर दण्डवत् लोटकर साष्टांग प्रणाम किया॥ ३५॥

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