॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.8.37
उत्थाय प्रांजलिः प्रह्व औत्सुक्यादाश्लिषन्निव।
नमो नम इतीशानौ बभाषे गद्गदाक्षरः॥ ३७
utthāya prāṃjaliḥ prahva autsukyādāśliṣanniva|
namo nama itīśānau babhāṣe gadgadākṣaraḥ|| 37
अर्थ
तदनन्तर वे हाथ जोड़कर उठ खड़े हुए। उनका अंग-अंग भगवान्के सामने झुका जा रहा था। उनके हृदयमें उत्सुकता तो इतनी थी, मानो वे भगवान्का आलिंगन कर लेंगे। उनसे और कुछ तो बोला न गया, गद्गद वाणीसे केवल इतना ही कहा—‘नमस्कार! नमस्कार’॥ ३७॥