श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.46

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तस्मात्तवेह भगवन्‍नथ तावकानां

शुक्लां तनुं स्वदयितां कुशला भजन्ति।

यत् सात्वताः पुरुषरूपमुशन्ति सत्त्वं

लोको यतोऽभयमुतात्मसुखं न चान्यत्॥ ४६

tasmāttaveha bhagavannatha tāvakānāṃ

śuklāṃ tanuṃ svadayitāṃ kuśalā bhajanti|

yat sātvatāḥ puruṣarūpamuśanti sattvaṃ

loko yato'bhayamutātmasukhaṃ na cānyat|| 46

अर्थ

भगवन्! इसलिये बुद्धिमान् पुरुष आपकी और आपके भक्तोंकी परम प्रिय एवं शुद्ध मूर्ति नर-नारायणकी ही उपासना करते हैं। पांचरात्र-सिद्धान्तके अनुयायी विशुद्ध सत्त्वको ही आपका श्रीविग्रह मानते हैं। उसीकी उपासनासे आपके नित्यधाम वैकुण्ठकी प्राप्ति होती है। उस धामकी यह विलक्षणता है कि वह लोक होनेपर भी सर्वथा भयरहित और भोगयुक्त होनेपर भी आत्मानन्दसे परिपूर्ण है। वे रजोगुण और तमोगुणको आपकी मूर्ति स्वीकार नहीं करते॥ ४६॥

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