श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.9.13

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

अन्तर्बहिश्‍चाद्भिरतिद्युभिः खरैः

शतह्रदाभीरुपतापितं जगत्।✎ 1244

चतुर्विधं वीक्ष्य सहात्मना मुनि-

र्जलाप्लुतां क्ष्मां विमनाः समत्रसत्॥ १३

antarbahiścādbhiratidyubhiḥ kharaiḥ

śatahradābhīrupatāpitaṃ jagat|

caturvidhaṃ vīkṣya sahātmanā muni-

rjalāplutāṃ kṣmāṃ vimanāḥ samatrasat|| 13

अर्थ

उस समय बाहर-भीतर, चारों ओर जल-ही-जल दीखता था। ऐसा जान पड़ता था कि उस जलराशिमें पृथ्वी ही नहीं, स्वर्ग भी डूबा जा रहा है; ऊपरसे बड़े वेगसे आँधी चल रही है और बिजली चमक रही है, जिससे सम्पूर्ण जगत् संतप्त हो रहा है। जब मार्कण्डेय मुनिने देखा कि इस जल-प्रलयसे सारी पृथ्वी डूब गयी है, उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज—चारों प्रकारके प्राणी तथा स्वयं वे भी अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं, तब वे उदास हो गये और साथ ही अत्यन्त भयभीत भी॥ १३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1244 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): शतहृदाभीरुपतापितं → शतह्रदाभीरुपतापितं

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