॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.9.30
हिमालयं पुष्पवहां च तां नदीं
निजाश्रमं तत्र ऋषीनपश्यत्।
विश्वं विपश्यञ्छ्वसिताच्छिशोर्वै
बहिर्निरस्तो न्यपतल्लयाब्धौ॥ ३०
himālayaṃ puṣpavahāṃ ca tāṃ nadīṃ
nijāśramaṃ tatra ṛṣīnapaśyat|
viśvaṃ vipaśyañchvasitācchiśorvai
bahirnirasto nyapatallayābdhau|| 30
अर्थ
हिमालय पर्वत, वही पुष्पभद्रा नदी, उसके तटपर अपना आश्रम और वहाँ रहनेवाले ऋषियोंको भी मार्कण्डेयजीने प्रत्यक्ष ही देखा। इस प्रकार सम्पूर्ण विश्वको देखते-देखते ही वे उस दिव्य शिशुके श्वासके द्वारा ही बाहर आ गये और फिर प्रलयकालीन समुद्रमें गिर पड़े॥ ३०॥