श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.9.30

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

हिमालयं पुष्पवहां च तां नदीं

निजाश्रमं तत्र ऋषीनपश्यत्।

विश्‍वं विपश्यञ्छ्वसिताच्छिशोर्वै

बहिर्निरस्तो न्यपतल्लयाब्धौ॥ ३०

himālayaṃ puṣpavahāṃ ca tāṃ nadīṃ

nijāśramaṃ tatra ṛṣīnapaśyat|

viśvaṃ vipaśyañchvasitācchiśorvai

bahirnirasto nyapatallayābdhau|| 30

अर्थ

हिमालय पर्वत, वही पुष्पभद्रा नदी, उसके तटपर अपना आश्रम और वहाँ रहनेवाले ऋषियोंको भी मार्कण्डेयजीने प्रत्यक्ष ही देखा। इस प्रकार सम्पूर्ण विश्‍वको देखते-देखते ही वे उस दिव्य शिशुके श्‍वासके द्वारा ही बाहर आ गये और फिर प्रलयकालीन समुद्रमें गिर पड़े॥ ३०॥

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