श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

स एष दोषः पुरुषद्विडास्ते

गृहान् प्रविष्टो यमपत्यमत्या।

पुष्णासि कृष्णाद्विमुखो गतश्री-

स्त्यजाश्‍वशैवं कुलकौशलाय॥ १३

sa eṣa doṣaḥ puruṣadviḍāste

gṛhān praviṣṭo yamapatyamatyā|

puṣṇāsi kṛṣṇādvimukho gataśrī-

styajāśvaśaivaṃ kulakauśalāya|| 13

अर्थ

जिसे आप पुत्र मानकर पाल रहे हैं तथा जिसकी हाँ-में-हाँ मिलाते जा रहे हैं, उस दुर्योधनके रूपमें तो मूर्तिमान् दोष ही आपके घरमें घुसा बैठा है। यह तो साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णसे द्वेष करनेवाला है। इसीके कारण आप भगवान् श्रीकृष्णसे विमुख होकर श्रीहीन हो रहे हैं। अतएव यदि आप अपने कुलकी कुशल चाहते हैं तो इस दुष्टको तुरन्त ही त्याग दीजिये’॥ १३॥

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