श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.16

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

स इत्थमत्युल्बणकर्णबाणै-

र्भ्रातुः पुरो मर्मसु ताडितोऽपि।

स्वयं धनुर्द्वारि निधाय मायां

गतव्यथोऽयादुरु मानयानः॥ १६

sa itthamatyulbaṇakarṇabāṇai-

rbhrātuḥ puro marmasu tāḍito'pi|

svayaṃ dhanurdvāri nidhāya māyāṃ

gatavyatho'yāduru mānayānaḥ|| 16

अर्थ

भाईके सामने ही कानोंमें बाणके समान लगनेवाले इन अत्यन्त कठोर वचनोंसे मर्माहत होकर भी विदुरजीने कुछ बुरा न माना और भगवान्‌की मायाको प्रबल समझकर अपना धनुष राजद्वारपर रख वे हस्तिनापुरसे चल दिये॥ १६॥✎ 183 184 185 1584

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #183 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #184 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #185 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1584 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अवधूत-वेषमें → अवधूतवेषमें

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