श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तस्यां त्रितस्योशनसो मनोश्‍च

पृथोरथाग्नेरसितस्य वायोः।

तीर्थं सुदासस्य गवां गुहस्य

यच्छ्राद्धदेवस्य स आसिषेवे॥ २२

tasyāṃ tritasyośanaso manośca

pṛthorathāgnerasitasya vāyoḥ|

tīrthaṃ sudāsasya gavāṃ guhasya

yacchrāddhadevasya sa āsiṣeve|| 22

अर्थ

वहाँ उन्होंने त्रित, उशना, मनु, पृथु, अग्‍नि, असित, वायु, सुदास, गौ, गुह और श्राद्धदेवके नामोंसे प्रसिद्ध ग्यारह तीर्थोंका सेवन किया॥ २२॥ इनके सिवा पृथ्वीमें ब्राह्मण और देवताओंके स्थापित किये हुए जो भगवान् विष्णुके और भी अनेकों मन्दिर थे, जिनके शिखरोंपर भगवान्‌के प्रधान आयुध चक्रके चिह्न थे और जिनके दर्शनमात्रसे श्रीकृष्णका स्मरण हो आता था, उनका भी सेवन किया॥ २३॥ वहाँसे चलकर वे धन-धान्यपूर्ण सौराष्ट्र, सौवीर, मत्स्य और कुरुजांगल आदि देशोंमें होते हुए जब कुछ दिनोंमें यमुनातटपर पहुँचे, तब वहाँ उन्होंने परमभागवत उद्धवजीका दर्शन किया॥ २४॥ वे भगवान् श्रीकृष्णके प्रख्यात सेवक और अत्यन्त शान्तस्वभाव थे। वे पहले बृहस्पतिजीके शिष्य रह चुके थे। विदुरजीने उन्हें देखकर प्रेमसे गाढ़ आलिंगन किया और उनसे अपने आराध्य भगवान् श्रीकृष्ण और उनके आश्रित अपने स्वजनोंका कुशल-समाचार पूछा॥ २५॥

यह व्याख्या श्लोक 3.1.22 से 3.1.25 तककी एक साथ है।

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