श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.39

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यमावुतस्वित्तनयौ पृथायाः

पार्थैर्वृतौ पक्ष्मभिरक्षिणीव।

रेमात उद्दाय मृधे स्वरिक्थं

परात्सुपर्णाविव वज्रिवक्‍त्रात्॥ ३९

yamāvutasvittanayau pṛthāyāḥ

pārthairvṛtau pakṣmabhirakṣiṇīva|

remāta uddāya mṛdhe svarikthaṃ

parātsuparṇāviva vajrivaktrāt|| 39

अर्थ

पलक जिस प्रकार नेत्रोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार कुन्तीके पुत्र युधिष्ठिरादि जिनकी सर्वदा सँभाल रखते हैं और कुन्तीने ही जिनका लालन-पालन किया है, वे माद्रीके यमज पुत्र नकुल-सहदेव कुशलसे तो हैं न? उन्होंने युद्धमें शत्रुसे अपना राज्य उसी प्रकार छीन लिया, जैसे दो गरुड़ इन्द्रके मुखसे अमृत निकाल लायें॥ ३९॥✎ 188

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #188 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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