श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.42

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

सोऽहं हरेर्मर्त्यविडम्बनेन

दृशो नृणां चालयतो विधातुः।

नान्योपलक्ष्यः पदवीं प्रसादा-

च्चरामि पश्यन् गतविस्मयोऽत्र॥ ४२

so'haṃ harermartyaviḍambanena

dṛśo nṛṇāṃ cālayato vidhātuḥ|

nānyopalakṣyaḥ padavīṃ prasādā-

ccarāmi paśyan gatavismayo'tra|| 42

अर्थ

किंतु भाई! मुझे इसका कुछ भी खेद अथवा आश्‍चर्य नहीं है। जगद्विधाता भगवान् श्रीकृष्ण ही मनुष्योंकी-सी लीलाएँ करके लोगोंकी मनोवृत्तियोंको भ्रमित कर देते हैं। मैं तो उन्हींकी कृपासे उनकी महिमाको देखता हुआ दूसरोंकी दृष्टिसे दूर रहकर सानन्द विचर रहा हूँ॥ ४२॥✎ 188

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #188 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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