श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.10.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

कालद्रव्यगुणैरस्य त्रिविधः प्रतिसंक्रमः।

आद्यस्तु महतः सर्गो गुणवैषम्यमात्मनः॥ १४

kāladravyaguṇairasya trividhaḥ pratisaṃkramaḥ|

ādyastu mahataḥ sargo guṇavaiṣamyamātmanaḥ|| 14

अर्थ

और इसका प्रलय काल, द्रव्य तथा गुणोंके द्वारा तीन प्रकारसे होता है। (अब पहले मैं दस प्रकारकी सृष्टिका वर्णन करता हूँ) पहली सृष्टि महत्तत्त्वकी है। भगवान्‌की प्रेरणासे सत्त्वादि गुणोंमें विषमता होना ही इसका स्वरूप है॥ १४॥✎ 242 243 244 245

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #242 शब्दोंके बीचका स्थान: सृष्टियोंकाभी → सृष्टियोंका भी
  • #243 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #244 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #245 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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