श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.10.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

वैकृतास्त्रय एवैते१ देवसर्गश्‍च सत्तम।

वैकारिकस्तु यः प्रोक्तः कौमारस्तूभयात्मकः॥ २६

vaikṛtāstraya evaite devasargaśca sattama|

vaikārikastu yaḥ proktaḥ kaumārastūbhayātmakaḥ|| 26

अर्थ

स्थावर, पशु-पक्षी और मनुष्य—ये तीनों प्रकारकी सृष्टियाँ तथा आगे कहा जानेवाला देवसर्ग वैकृत सृष्टि हैं तथा जो महत्तत्त्वादिरूप वैकारिक देवसर्ग है, उसकी गणना पहले प्राकृत सृष्टिमें की जा चुकी है। इनके अतिरिक्त सनत्कुमार आदि ऋषियोंका जो कौमारसर्ग है, वह प्राकृत-वैकृत दोनों प्रकारका है॥ २६॥✎ 1589

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—एते वै।

    (मुद्रित पृष्ठ 281)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1589 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (मुँह)-से → (मुँह)से

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