विदुरजी! चार-चार पहरके मनुष्यके ‘दिन’ और ‘रात’ होते हैं और पन्द्रह दिन-रातका एक ‘पक्ष’ होता है, जो शुक्ल और कृष्ण भेदसे दो प्रकारका माना गया है॥ १०॥
यामाश्चत्वारश्चत्वारो मर्त्यानामहनी उभे।
पक्षः पञ्चदशाहानि शुक्लः कृष्णश्च मानद॥ १०
विदुरजी! चार-चार पहरके मनुष्यके ‘दिन’ और ‘रात’ होते हैं और पन्द्रह दिन-रातका एक ‘पक्ष’ होता है, जो शुक्ल और कृष्ण भेदसे दो प्रकारका माना गया है॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.11.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 283) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/11/10/