श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.11.24

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

स्वं स्वं कालं मनुर्भुङ्क्ते साधिकां ह्येकसप्ततिम्।

मन्वन्तरेषु मनवस्तद्वंश्या ऋषयः सुराः।

भवन्ति चैव युगपत्सुरेशाश्चानु ये च तान्॥ २४

svaṃ svaṃ kālaṃ manurbhuṅkte sādhikāṃ hyekasaptatim|

manvantareṣu manavastadvaṃśyā ṛṣayaḥ surāḥ|

bhavanti caiva yugapatsureśāścānu ye ca tān|| 24

अर्थ

प्रत्येक मनु इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक काल (७१ चतुर्युगी) तक अपना अधिकार भोगता है। प्रत्येक मन्वन्तरमें भिन्‍न-भिन्‍न मनुवंशी राजालोग, सप्तर्षि, देवगण, इन्द्र और उनके अनुयायी गन्धर्वादि साथ-साथ ही अपना अधिकार भोगते हैं॥ २४॥✎ 246 247

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #246 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #247 शब्दोंके बीचका स्थान: २४॥यह → २४॥ यह

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