श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.11.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

स कालः परमाणुर्वै यो भुङ्क्ते परमाणुताम्।

सतोऽविशेषभुग्यस्तु स२ कालः परमो महान्॥ ४

sa kālaḥ paramāṇurvai yo bhuṅkte paramāṇutām|

sato'viśeṣabhugyastu sa kālaḥ paramo mahān|| 4

अर्थ

जो काल प्रपंचकी परमाणु-जैसी सूक्ष्म अवस्थामें व्याप्त रहता है, वह अत्यन्त सूक्ष्म है और जो सृष्टिसे लेकर प्रलयपर्यन्त उसकी सभी अवस्थाओंका भोग करता है, वह परम महान् है॥ ४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—कालः स।

    (मुद्रित पृष्ठ 282)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें