श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.11.40

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

दशोत्तराधिकैर्यत्र प्रविष्टः परमाणुवत्।

लक्ष्यतेऽन्तर्गताश्चान्ये कोटिशो ह्यण्डराशयः॥ ४०

daśottarādhikairyatra praviṣṭaḥ paramāṇuvat|

lakṣyate'ntargatāścānye koṭiśo hyaṇḍarāśayaḥ|| 40

अर्थ

प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्र—इन आठ प्रकृतियोंके सहित दस इन्द्रियाँ, मन और पंचभूत—इन सोलह विकारोंसे मिलकर बना हुआ यह ब्रह्माण्डकोश भीतरसे पचास करोड़ योजन विस्तारवाला है तथा इसके बाहर चारों ओर उत्तरोत्तर दस-दस गुने सात आवरण हैं। उन सबके सहित यह जिसमें परमाणुके समान पड़ा हुआ दीखता है और जिसमें ऐसी करोड़ों ब्रह्माण्डराशियाँ हैं, वह इन प्रधानादि समस्त कारणोंका कारण अक्षर ब्रह्म कहलाता है और यही पुराणपुरुष परमात्मा श्रीविष्णुभगवान्‌का श्रेष्ठ धाम (स्वरूप) है॥ ३९—४१॥

यह अर्थ श्लोक 39–41 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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