॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.12.11
हृदिन्द्रियाण्यसुर्व्योम वायुरग्निर्जलं मही।
सूर्यश्चन्द्रस्तपश्चैव स्थानान्यग्रे कृतानि मे२॥ ११
hṛdindriyāṇyasurvyoma vāyuragnirjalaṃ mahī|
sūryaścandrastapaścaiva sthānānyagre kṛtāni me|| 11
अर्थ
तुम्हारे रहनेके लिये मैंने पहलेसे ही हृदय, इन्द्रिय, प्राण, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा और तप—ये स्थान रच दिये हैं॥ ११॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—ते।