अनुक्रमणिकातृतीय स्कन्धअध्याय 12श्लोक 24॥ श्रीहरिः ॥श्लोक 3.12.24तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायःपुलहो नाभितो जज्ञे पुलस्त्यः कर्णयोर्ऋषिः।✎ 1007 1008अङ्गिरा मुखतोऽक्ष्णोऽत्रिर्मरीचिर्मनसोऽभवत्॥ २४ pulaho nābhito jajñe pulastyaḥ karṇayor:ṛṣiḥ|aṅgirā mukhato'kṣṇo'trirmarīcirmanaso'bhavat|| 24अर्थ▶ अर्थ सुनें■ बन्दगतिधीमीसामान्यतेज़इनमें नारदजी प्रजापति ब्रह्माजीकी गोदसे, दक्ष अँगूठेसे, वसिष्ठ प्राणसे, भृगु त्वचासे, क्रतु हाथसे, पुलह नाभिसे, पुलस्त्य ऋषि कानोंसे, अंगिरा मुखसे, अत्रि नेत्रोंसे और मरीचि मनसे उत्पन्न हुए॥ २३-२४॥✎ 250 1304 1305यह अर्थ श्लोक 23–24 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।पुलहो नाभितो जज्ञे पुलस्त्यः कर्णयोर्ऋषिः। अङ्गिरा मुखतोऽक्ष्णोऽत्रिर्मरीचिर्मनसोऽभवत्॥ २४ इनमें नारदजी प्रजापति ब्रह्माजीकी गोदसे, दक्ष अँगूठेसे, वसिष्ठ प्राणसे, भृगु त्वचासे, क्रतु हाथसे, पुलह नाभिसे, पुलस्त्य ऋषि कानोंसे, अंगिरा मुखसे, अत्रि नेत्रोंसे और मरीचि मनसे उत्पन्न हुए॥ २३-२४॥ श्रीमद्भागवत महापुराण 3.12.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 288) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/12/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)#250 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की#1007 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कर्णयोऋर्षि:। → कर्णयोऋर्ऋषिः।#1008 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कर्णयोऋर्ऋषि:। → कर्णयोर्ऋषिः।#1304 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति॥ → निऋर्ऋति॥#1305 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति॥ → निर्ऋति॥← पिछला श्लोकश्लोक 3.12.23अगला श्लोक →श्लोक 3.12.25