अनुक्रमणिकातृतीय स्कन्धअध्याय 12श्लोक 26॥ श्रीहरिः ॥श्लोक 3.12.26तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायःहृदि कामो भ्रुवः क्रोधो लोभश्चाधरदच्छदात्।आस्याद्वाक्सिन्धवो मेढ्रान्निर्ऋतिः पायोरघाश्रयः॥ २६ ✎ 1009 1010hṛdi kāmo bhruvaḥ krodho lobhaścādharadacchadāt|āsyādvāksindhavo meḍhrānnir:ṛtiḥ pāyoraghāśrayaḥ|| 26अर्थ▶ अर्थ सुनें■ बन्दगतिधीमीसामान्यतेज़इसी प्रकार ब्रह्माजीके हृदयसे काम, भौंहोंसे क्रोध, नीचेके होठसे लोभ, मुखसे वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती, लिंगसे समुद्र, गुदासे पापका निवासस्थान (राक्षसोंका अधिपति) निर्ऋति॥ २६॥✎ 250 1304 1305हृदि कामो भ्रुवः क्रोधो लोभश्चाधरदच्छदात्। आस्याद्वाक्सिन्धवो मेढ्रान्निर्ऋतिः पायोरघाश्रयः॥ २६ इसी प्रकार ब्रह्माजीके हृदयसे काम, भौंहोंसे क्रोध, नीचेके होठसे लोभ, मुखसे वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती, लिंगसे समुद्र, गुदासे पापका निवासस्थान (राक्षसोंका अधिपति) निर्ऋति॥ २६॥ श्रीमद्भागवत महापुराण 3.12.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 288) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/12/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)#250 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की#1009 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मेढ्रान्निऋर्ति: → मेढ्रान्निऋर्ऋतिः#1010 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मेढ्रान्निऋर्ऋति: → मेढ्रान्निर्ऋतिः#1304 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति॥ → निऋर्ऋति॥#1305 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति॥ → निर्ऋति॥← पिछला श्लोकश्लोक 3.12.25अगला श्लोक →श्लोक 3.12.27