श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.12.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

नैतत्पूर्वैः कृतं त्वद्ये न करिष्यन्ति चापरे।

यत्त्वं दुहितरं गच्छेरनिगृह्याङ्गजं प्रभुः॥ ३०

naitatpūrvaiḥ kṛtaṃ tvadye na kariṣyanti cāpare|

yattvaṃ duhitaraṃ gaccheranigṛhyāṅgajaṃ prabhuḥ|| 30

अर्थ

‘पिताजी! आप समर्थ हैं, फिर भी अपने मनमें उत्पन्‍न हुए कामके वेगको न रोककर पुत्रीगमन-जैसा दुस्तर पाप करनेका संकल्प कर रहे हैं! ऐसा तो आपसे पूर्ववर्ती किसी भी ब्रह्माने नहीं किया और न आगे ही कोई करेगा॥ ३०॥✎ 251

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #251 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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