‘पिताजी! आप समर्थ हैं, फिर भी अपने मनमें उत्पन्न हुए कामके वेगको न रोककर पुत्रीगमन-जैसा दुस्तर पाप करनेका संकल्प कर रहे हैं! ऐसा तो आपसे पूर्ववर्ती किसी भी ब्रह्माने नहीं किया और न आगे ही कोई करेगा॥ ३०॥✎ 251
नैतत्पूर्वैः कृतं त्वद्ये न करिष्यन्ति चापरे।
यत्त्वं दुहितरं गच्छेरनिगृह्याङ्गजं प्रभुः॥ ३०
‘पिताजी! आप समर्थ हैं, फिर भी अपने मनमें उत्पन्न हुए कामके वेगको न रोककर पुत्रीगमन-जैसा दुस्तर पाप करनेका संकल्प कर रहे हैं! ऐसा तो आपसे पूर्ववर्ती किसी भी ब्रह्माने नहीं किया और न आगे ही कोई करेगा॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.12.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 289) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/12/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#251 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने