श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.12.42

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सावित्रं प्राजापत्यं च ब्राह्मं चाथ बृहत्तथा।

वार्तासञ्चयशालीनशिलोञ्छ इति वै गृहे॥ ४२

sāvitraṃ prājāpatyaṃ ca brāhmaṃ cātha bṛhattathā|

vārtāsañcayaśālīnaśiloñcha iti vai gṛhe|| 42

अर्थ

सावित्र*, प्राजापत्य१, ब्राह्म२ और बृहत्३—ये चार वृत्तियाँ ब्रह्मचारीकी हैं तथा वार्ता४, संचय५, शालीन६ और शिलोञ्छ७—ये चार वृत्तियाँ गृहस्थकी हैं॥ ४२॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    उपनयन-संस्कारके पश्चात् गायत्रीका अध्ययन करनेके लिये धारण किया जानेवाला तीन दिनका ब्रह्मचर्यव्रत।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  2. १

    एक वर्षका ब्रह्मचर्यव्रत।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  3. २

    वेदाध्ययनकी समाप्तितक रहनेवाला ब्रह्मचर्यव्रत।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  4. ३

    आयुपर्यन्त रहनेवाला ब्रह्मचर्यव्रत।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  5. ४

    कृषि आदि शास्त्रविहित वृत्तियाँ।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  6. ५

    यागादि कराना।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  7. ६

    अयाचितवृत्ति।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  8. ७

    खेत कट जानेपर पृथ्वीपर पड़े हुए तथा अनाजकी मंडीमें गिरे हुए दानोंको बीनकर निर्वाह करना।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)

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