श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.12.51

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

न ह्येधन्ते प्रजा नूनं दैवमत्र विघातकम्।

एवं युक्तकृतस्तस्य दैवं चावेक्षतस्तदा॥ ५१

na hyedhante prajā nūnaṃ daivamatra vighātakam|

evaṃ yuktakṛtastasya daivaṃ cāvekṣatastadā|| 51

अर्थ

विदुरजी! ब्रह्माजीने पहला कामासक्त शरीर जिससे कुहरा बना था—छोड़नेके बाद दूसरा शरीर धारण करके विश्‍वविस्तारका विचार किया; वे देख चुके थे कि मरीचि आदि महान् शक्तिशाली ऋषियोंसे भी सृष्टिका विस्तार अधिक नहीं हुआ, अतः वे मन-ही-मन पुनः चिन्ता करने लगे—‘अहो! बड़ा आश्‍चर्य है, मेरे निरन्तर प्रयत्न करनेपर भी प्रजाकी वृद्धि नहीं हो रही है। मालूम होता है इसमें दैव ही कुछ विघ्न डाल रहा है। ‘जिस समय यथोचित क्रिया करनेवाले श्रीब्रह्माजी इस प्रकार दैवके विषयमें विचार कर रहे थे उसी समय अकस्मात् उनके शरीरके दो भाग हो गये। ‘क’ ब्रह्माजीका नाम है, उन्हींसे विभक्त होनेके कारण शरीरको ‘काय’ कहते हैं। उन दोनों विभागोंसे एक स्त्री-पुरुषका जोड़ा प्रकट हुआ॥ ४९—५२॥

यह अर्थ श्लोक 49–52 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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