श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

विदुर उवाच

स वै स्वायम्भुवः सम्राट् प्रियः पुत्रः स्वयम्भुवः।

प्रतिलभ्य प्रियां पत्नीं किं चकार ततो मुने॥ २

sa vai svāyambhuvaḥ samrāṭ priyaḥ putraḥ svayambhuvaḥ|

pratilabhya priyāṃ patnīṃ kiṃ cakāra tato mune|| 2

अर्थ

विदुरजीने कहा—मुने! स्वयम्भू ब्रह्माजीके प्रिय पुत्र महाराज स्वायम्भुव मनुने अपनी प्रिय पत्‍नी शतरूपाको पाकर फिर क्या किया?॥ २॥✎ 1306

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1306 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीविष्णु-भगवान्‌के → श्रीविष्णुभगवान्‌के

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें