श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

ऋषय ऊचुः

जितं जितं तेऽजित यज्ञभावन

त्रयीं तनुं स्वां परिधुन्वते नमः।

यद्रोमगर्तेषु१ निलिल्युरध्वरा-

स्तस्मै नमः कारणसूकराय ते॥ ३४

jitaṃ jitaṃ te'jita yajñabhāvana

trayīṃ tanuṃ svāṃ paridhunvate namaḥ|

yadromagarteṣu nililyuradhvarā-

stasmai namaḥ kāraṇasūkarāya te|| 34

अर्थ

ऋषियोंने कहा—भगवान् अजित्! आपकी जय हो, जय हो। यज्ञपते! आप अपने वेदत्रयीरूप विग्रहको फटकार रहे हैं; आपको नमस्कार है। आपके रोम-कूपोंमें सम्पूर्ण यज्ञ लीन हैं। आपने पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये ही यह सूकररूप धारण किया है; आपको नमस्कार है॥ ३४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मकूपेषु।

    (मुद्रित पृष्ठ 296)

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