जिनके हृदयमें श्रीमुकुन्दके चरणारविन्द विराजमान हैं, उन भक्तजनोंके गुणोंको श्रवण करना ही मनुष्योंके बहुत दिनोंतक किये हुए शास्त्राभ्यासके श्रमका मुख्य फल है, ऐसा विद्वानोंका श्रेष्ठ मत है॥ ४॥✎ 1306
श्रुतस्य पुंसां सुचिरश्रमस्य
नन्वञ्जसा सूरिभिरीडितोऽर्थः।
यत्तद्गुणानुश्रवणं मुकुन्द-
पादारविन्दं हृदयेषु येषाम्॥ ४
जिनके हृदयमें श्रीमुकुन्दके चरणारविन्द विराजमान हैं, उन भक्तजनोंके गुणोंको श्रवण करना ही मनुष्योंके बहुत दिनोंतक किये हुए शास्त्राभ्यासके श्रमका मुख्य फल है, ऐसा विद्वानोंका श्रेष्ठ मत है॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.13.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 292) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/13/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1306 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीविष्णु-भगवान्के → श्रीविष्णुभगवान्के