श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

श्रुतस्य पुंसां सुचिरश्रमस्य

नन्वञ्जसा सूरिभिरीडितोऽर्थः।

यत्तद‍्गुणानुश्रवणं मुकुन्द-

पादारविन्दं हृदयेषु येषाम्॥ ४

śrutasya puṃsāṃ suciraśramasya

nanvañjasā sūribhirīḍito'rthaḥ|

yattadguṇānuśravaṇaṃ mukunda-

pādāravindaṃ hṛdayeṣu yeṣām|| 4

अर्थ

जिनके हृदयमें श्रीमुकुन्दके चरणारविन्द विराजमान हैं, उन भक्तजनोंके गुणोंको श्रवण करना ही मनुष्योंके बहुत दिनोंतक किये हुए शास्त्राभ्यासके श्रमका मुख्य फल है, ऐसा विद्वानोंका श्रेष्ठ मत है॥ ४॥✎ 1306

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1306 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीविष्णु-भगवान्‌के → श्रीविष्णुभगवान्‌के

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