श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.40

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

द्रंष्ट्राग्रकोट्या भगवंस्त्वया धृता

विराजते भूधर भूः सभूधरा।

यथा वनान्‍निःसरतो दता धृता

मतङ्गजेन्द्रस्य सपत्रपद्मिनी॥ ४०

draṃṣṭrāgrakoṭyā bhagavaṃstvayā dhṛtā

virājate bhūdhara bhūḥ sabhūdharā|

yathā vanānniḥsarato datā dhṛtā

mataṅgajendrasya sapatrapadminī|| 40

अर्थ

पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवन्! आपकी दाढ़ोंकी नोकपर रखी हुई यह पर्वतादि-मण्डित पृथ्वी ऐसी सुशोभित हो रही है, जैसे वनमेंसे निकलकर बाहर आये हुए किसी गजराजके दाँतोंपर पत्रयुक्त कमलिनी रखी हो॥ ४०॥

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