श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.43

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

कः श्रद्दधीतान्यतमस्तव प्रभो

रसां गताया भुव उद्विबर्हणम्।

न विस्मयोऽसौ त्वयि विश्‍वविस्मये

यो माययेदं ससृजेऽतिविस्मयम्॥ ४३

kaḥ śraddadhītānyatamastava prabho

rasāṃ gatāyā bhuva udvibarhaṇam|

na vismayo'sau tvayi viśvavismaye

yo māyayedaṃ sasṛje'tivismayam|| 43

अर्थ

प्रभो! रसातलमें डूबी हुई इस पृथ्वीको निकालनेका साहस आपके सिवा और कौन कर सकता था। किंतु आप तो सम्पूर्ण आश्‍चर्योंके आश्रय हैं, आपके लिये यह कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है। आपने ही तो अपनी मायासे इस अत्याश्‍चर्यमय विश्‍वकी रचना की है॥ ४३॥

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