इस प्रकार रसातलसे लीलापूर्वक लायी हुई पृथ्वीको जलपर रखकर वे विष्वक्सेन प्रजापति भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये॥ ४७॥✎ 256
स इत्थं भगवानुर्वीं विष्वक्सेनः प्रजापतिः।
रसाया लीलयोन्नीतामप्सु न्यस्य ययौ हरिः॥ ४७
इस प्रकार रसातलसे लीलापूर्वक लायी हुई पृथ्वीको जलपर रखकर वे विष्वक्सेन प्रजापति भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.13.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 298) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/13/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#256 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् ने → वराहभगवान्ने