श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.50

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

को नाम लोके पुरुषार्थसारवित्

पुराकथानां भगवत्कथासुधाम्।

आपीय कर्णाञ्जलिभिर्भवापहा-

महो विरज्येत विना नरेतरम्॥ ५०

ko nāma loke puruṣārthasāravit

purākathānāṃ bhagavatkathāsudhām|

āpīya karṇāñjalibhirbhavāpahā-

maho virajyeta vinā naretaram|| 50

अर्थ

अरे! संसारमें पशुओंको छोड़कर अपने पुरुषार्थका सार जाननेवाला ऐसा कौन पुरुष होगा, जो आवागमनसे छुड़ा देनेवाली भगवान्‌की प्राचीन कथाओंमेंसे किसी भी अमृतमयी कथाका अपने कर्णपुटोंसे एक बार पान करके फिर उनकी ओरसे मन हटा लेगा॥ ५०॥✎ 257

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
वराहप्रादुर्भावानुवर्णने त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #257 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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