श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

त्वमेकः सर्वभूतानां जन्मकृद् वृत्तिदः पिता।

अथापि नः प्रजानां ते शुश्रूषा केन वा भवेत्॥ ७

tvamekaḥ sarvabhūtānāṃ janmakṛd vṛttidaḥ pitā|

athāpi naḥ prajānāṃ te śuśrūṣā kena vā bhavet|| 7

अर्थ

‘भगवन्! एकमात्र आप ही समस्त जीवोंके जन्मदाता और जीविका प्रदान करनेवाले पिता हैं। तथापि हम आपकी सन्तान ऐसा कौन-सा कर्म करें, जिससे आपकी सेवा बन सके?॥ ७॥

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