श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.20

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

न वयं प्रभवस्तां त्वामनुकर्तुं गृहेश्‍वरि।

अप्यायुषा वा कार्त्स्न्येन ये चान्ये गुणगृध्नवः॥ २०

na vayaṃ prabhavastāṃ tvāmanukartuṃ gṛheśvari|

apyāyuṣā vā kārtsnyena ye cānye guṇagṛdhnavaḥ|| 20

अर्थ

गृहेश्‍वरि! तुम-जैसी भार्याके उपकारोंका बदला तो हम अथवा और कोई भी गुणग्राही पुरुष अपनी सारी उम्रमें अथवा जन्मान्तरमें भी पूर्णरूपसे नहीं चुका सकते॥ २०॥

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