श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

यस्यानवद्याचरितं मनीषिणो

गृणन्त्यविद्यापटलं बिभित्सवः।

निरस्तसाम्यातिशयोऽपि यत्स्वयं

पिशाचचर्यामचरद्गतिः सताम्॥ २६

yasyānavadyācaritaṃ manīṣiṇo

gṛṇantyavidyāpaṭalaṃ bibhitsavaḥ|

nirastasāmyātiśayo'pi yatsvayaṃ

piśācacaryāmacaradgatiḥ satām|| 26

अर्थ

विवेकी पुरुष अविद्याके आवरणको हटानेकी इच्छासे उनके निर्मल चरित्रका गान किया करते हैं; उनसे बढ़कर तो क्या, उनके समान भी कोई नहीं है और उनतक केवल सत्पुरुषोंकी ही पहुँच है। यह सब होनेपर भी वे स्वयं पिशाचोंका-सा आचरण करते हैं॥ २६॥

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