कश्यपजीने कहा—तुम्हारा चित्त कामवासनासे मलिन था, वह समय भी ठीक नहीं था और तुमने मेरी बात भी नहीं मानी तथा देवताओंकी भी अवहेलना की॥ ३७॥
अप्रायत्यादात्मनस्ते दोषान्मौहूर्तिकादुत।
मन्निदेशातिचारेण देवानां चातिहेलनात्॥ ३७
कश्यपजीने कहा—तुम्हारा चित्त कामवासनासे मलिन था, वह समय भी ठीक नहीं था और तुमने मेरी बात भी नहीं मानी तथा देवताओंकी भी अवहेलना की॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 302) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/14/37/