श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! दितिने जब सुना कि मेरा पौत्र भगवान्का भक्त होगा, तब उसे बड़ा आनन्द हुआ तथा यह जानकर कि मेरे पुत्र साक्षात् श्रीहरिके हाथसे मारे जायँगे, उसे और भी अधिक उत्साह हुआ॥ ५०॥
श्रुत्वा भागवतं पौत्रममोदत दितिर्भृशम्।
पुत्रयोश्च वधं कृष्णाद्विदित्वाऽऽसीन्महामनाः॥ ५०
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! दितिने जब सुना कि मेरा पौत्र भगवान्का भक्त होगा, तब उसे बड़ा आनन्द हुआ तथा यह जानकर कि मेरे पुत्र साक्षात् श्रीहरिके हाथसे मारे जायँगे, उसे और भी अधिक उत्साह हुआ॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 303) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/14/50/