श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

वसन्ति यत्र पुरुषाः सर्वे वैकुण्ठमूर्तयः।

येऽनिमित्तनिमित्तेन धर्मेणाराधयन् हरिम्॥ १४

vasanti yatra puruṣāḥ sarve vaikuṇṭhamūrtayaḥ|

ye'nimittanimittena dharmeṇārādhayan harim|| 14

अर्थ

श्रीब्रह्माजीने कहा—देवताओ! तुम्हारे पूर्वज, मेरे मानसपुत्र सनकादि लोकोंकी आसक्ति त्यागकर समस्त लोकोंमें आकाशमार्गसे विचरा करते थे॥ १२॥ एक बार वे भगवान् विष्णुके शुद्ध-सत्त्वमय सब लोकोंके शिरोभागमें स्थित, वैकुण्ठधाममें जा पहुँचे॥ १३॥ वहाँ सभी लोग विष्णुरूप होकर रहते हैं और वह प्राप्त भी उन्हींको होता है, जो अन्य सब प्रकारकी कामनाएँ छोड़कर केवल भगवच्चरण-शरणकी प्राप्तिके लिये ही अपने धर्मद्वारा उनकी आराधना करते हैं॥ १४॥ वहाँ वेदान्तप्रतिपाद्य धर्ममूर्ति श्रीआदिनारायण हम अपने भक्तोंको सुख देनेके लिये शुद्धसत्त्वमय स्वरूप धारणकर हर समय विराजमान रहते हैं॥ १५॥ उस लोकमें नैःश्रेयस नामका एक वन है, जो मूर्तिमान् कैवल्य-सा ही जान पड़ता है। वह सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले वृक्षोंसे सुशोभित है, जो स्वयं हर समय छहों ऋतुओंकी शोभासे सम्पन्‍न रहते हैं॥ १६॥

यह व्याख्या श्लोक 3.15.12 से 3.15.16 तककी एक साथ है।

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