श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

वैमानिकाः सललनाश्‍चरितानि यत्र

गायन्ति लोकशमलक्षपणानि भर्तुः।

अन्तर्जलेऽनुविकसन्मधुमाधवीनां

गन्धेन खण्डितधियोऽप्यनिलं क्षिपन्तः॥ १७

vaimānikāḥ salalanāścaritāni yatra

gāyanti lokaśamalakṣapaṇāni bhartuḥ|

antarjale'nuvikasanmadhumādhavīnāṃ

gandhena khaṇḍitadhiyo'pyanilaṃ kṣipantaḥ|| 17

अर्थ

वहाँ विमानचारी गन्धर्वगण अपनी प्रियाओंके सहित अपने प्रभुकी पवित्र लीलाओंका गान करते रहते हैं, जो लोगोंकी सम्पूर्ण पापराशिको भस्म कर देनेवाली हैं। उस समय सरोवरोंमें खिली हुई मकरन्दपूर्ण वासन्तिक माधवी लताकी सुमधुर गन्ध उनके चित्तको अपनी ओर खींचना चाहती है; परन्तु वे उसकी ओर ध्यान ही नहीं देते वरं उस गन्धको उड़ाकर लानेवाले वायुको ही बुरा-भला कहते हैं॥ १७॥

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