श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तद्विश्‍वगुर्वधिकृतं भुवनैकवन्द्यं

दिव्यं विचित्रविबुधाग्र्यविमानशोचिः।

आपुः परां मुदमपूर्वमुपेत्य योग-

मायाबलेन मुनयस्तदथो विकुण्ठम्॥ २६

tadviśvagurvadhikṛtaṃ bhuvanaikavandyaṃ

divyaṃ vicitravibudhāgryavimānaśociḥ|

āpuḥ parāṃ mudamapūrvamupetya yoga-

māyābalena munayastadatho vikuṇṭham|| 26

अर्थ

जिस समय सनकादि मुनि विश्‍वगुरु श्रीहरिके निवास-स्थान, सम्पूर्ण लोकोंके वन्दनीय और श्रेष्ठ देवताओंके विचित्र विमानोंसे विभूषित उस परम दिव्य और अद्भुत वैकुण्ठधाममें अपने योगबलसे पहुँचे, तब उन्हें बड़ा ही आनन्द हुआ॥ २६॥✎ 261 262 1307 1308

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #261 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #262 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1307 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वैकुण्ठ-लोकमें → वैकुण्ठलोकमें
  • #1308 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रति-बिम्ब → प्रतिबिम्ब

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