श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.29

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

द्वार्येतयोर्निविविशुर्मिषतोरपृष्ट्वा

पूर्वा यथा पुरटवज्रकपाटिका याः।

सर्वत्र१ तेऽविषमया मुनयः स्व२दृष्ट्या

ये सञ्चरन्त्यविहता विगताभिशङ्काः॥ २९

dvāryetayorniviviśurmiṣatorapṛṣṭvā

pūrvā yathā puraṭavajrakapāṭikā yāḥ|

sarvatra te'viṣamayā munayaḥ svadṛṣṭyā

ye sañcarantyavihatā vigatābhiśaṅkāḥ|| 29

अर्थ

उनके इस प्रकार देखते रहनेपर भी वे मुनिगण उनसे बिना कुछ पूछताछ किये, जैसे सुवर्ण और वज्रमय किवाड़ोंसे युक्त पहली छः ड्यौढ़ी लाँघकर आये थे, उसी प्रकार उनके द्वारमें भी घुस गये। उनकी दृष्टि तो सर्वत्र समान थी और वे निःशंक होकर सर्वत्र बिना किसी रोक-टोकके विचरते थे॥ २९॥✎ 1592

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—सर्वेऽपि ते।

    (मुद्रित पृष्ठ 308)
  2. २

    प्रा० पा०—स्ववृत्त्या।

    (मुद्रित पृष्ठ 308)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1592 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बालकों-से → बालकोंसे

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