श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.43

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द-

किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः।

अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां

सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः॥ ४३

tasyāravindanayanasya padāravinda-

kiñjalkamiśratulasīmakarandavāyuḥ|

antargataḥ svavivareṇa cakāra teṣāṃ

saṅkṣobhamakṣarajuṣāmapi cittatanvoḥ|| 43

अर्थ

सनकादि मुनीश्‍वर निरन्तर ब्रह्मानन्दमें निमग्न रहा करते थे। किन्तु जिस समय भगवान् कमलनयनके चरणारविन्दमकरन्दसे मिली हुई तुलसीमंजरीके गन्धसे सुवासित वायुने नासिकारन्ध्रोंके द्वारा उनके अन्तःकरणमें प्रवेश किया, उस समय वे अपने शरीरको सँभाल न सके और उस दिव्य गन्धने उनके मनमें भी खलबली पैदा कर दी॥ ४३॥

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