भगवान्की उक्ति बड़ी ही मनोहर और थोड़े अक्षरोंवाली थी; किन्तु वह इतनी अर्थपूर्ण, सारयुक्त, दुर्विज्ञेय और गम्भीर थी कि बहुत ध्यान देकर सुनने और विचार करनेपर भी वे यह न जान सके कि भगवान् क्या करना चाहते हैं॥ १४॥✎ 267
सतीं व्यादाय शृण्वन्तो लघ्वीं गुर्वर्थगह्वराम्।
विगाह्यागाधगम्भीरां न विदुस्तच्चिकीर्षितम्॥ १४
भगवान्की उक्ति बड़ी ही मनोहर और थोड़े अक्षरोंवाली थी; किन्तु वह इतनी अर्थपूर्ण, सारयुक्त, दुर्विज्ञेय और गम्भीर थी कि बहुत ध्यान देकर सुनने और विचार करनेपर भी वे यह न जान सके कि भगवान् क्या करना चाहते हैं॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.16.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 314) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/16/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)