श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तद्वः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म दैवं परं हि मे।

तद्धीत्यात्मकृतं मन्ये यत्स्वपुम्भिरसत्कृताः॥ ४

tadvaḥ prasādayāmyadya brahma daivaṃ paraṃ hi me|

taddhītyātmakṛtaṃ manye yatsvapumbhirasatkṛtāḥ|| 4

अर्थ

ब्राह्मण मेरे परम आराध्य हैं; मेरे अनुचरोंके द्वारा आपलोगोंका जो तिरस्कार हुआ है, उसे मैं अपना ही किया हुआ मानता हूँ। इसलिये मैं आपलोगोंसे प्रसन्‍नताकी भिक्षा माँगता हूँ॥ ४॥✎ 265

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #265 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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