॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.16.6
यस्यामृतामलयशःश्रवणावगाहः
सद्यः पुनाति जगदाश्वपचाद्विकुण्ठः।
सोऽहं भवद्भ्य उपलब्धसुतीर्थकीर्ति-
श्छिन्द्यां स्वबाहुमपि वः प्रतिकूलवृत्तिम्॥ ६
yasyāmṛtāmalayaśaḥśravaṇāvagāhaḥ
sadyaḥ punāti jagadāśvapacādvikuṇṭhaḥ|
so'haṃ bhavadbhya upalabdhasutīrthakīrti-
śchindyāṃ svabāhumapi vaḥ pratikūlavṛttim|| 6
अर्थ
मेरी निर्मल सुयश-सुधामें गोता लगानेसे चाण्डालपर्यन्त सारा जगत् तुरंत पवित्र हो जाता है, इसीलिये मैं ‘विकुण्ठ’ कहलाता हूँ। किन्तु यह पवित्र कीर्ति मुझे आपलोगोंसे ही प्राप्त हुई है। इसलिये जो कोई आपके विरुद्ध आचरण करेगा, वह मेरी भुजा ही क्यों न हो—मैं उसे तुरन्त काट डालूँगा॥ ६॥✎ 1309