श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.9

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

येषां बिभर्म्यहमखण्डविकुण्ठयोग-

मायाविभूतिरमलाङ्‌घ्रिरजः किरीटैः।

विप्रांस्तु को न विषहेत यदर्हणाम्भः

सद्यः पुनाति सहचन्द्रललामलोकान्॥ ९

yeṣāṃ bibharmyahamakhaṇḍavikuṇṭhayoga-

māyāvibhūtiramalāṅghrirajaḥ kirīṭaiḥ|

viprāṃstu ko na viṣaheta yadarhaṇāmbhaḥ

sadyaḥ punāti sahacandralalāmalokān|| 9

अर्थ

योगमायाका अखण्ड और असीम ऐश्‍वर्य मेरे अधीन है तथा मेरी चरणोदकरूपिणी गंगाजी चन्द्रमाको मस्तकपर धारण करनेवाले भगवान् शंकरके सहित समस्त लोकोंको पवित्र करती हैं। ऐसा परम पवित्र एवं परमेश्‍वर होकर भी मैं जिनकी पवित्र चरण-रजको अपने मुकुटपर धारण करता हूँ, उन ब्राह्मणोंके कर्मको कौन नहीं सहन करेगा॥ ९॥✎ 1309

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1309 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रसन्‍न-चित्तसे → प्रसन्‍नचित्तसे

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