जब दैत्यराज हिरण्याक्षने देखा कि मेरे तेजके सामने बड़े-बड़े गर्वीले इन्द्रादि देवता भी छिप गये हैं, तब उन्हें अपने सामने न देखकर वह बार-बार भयंकर गर्जना करने लगा॥ २३॥
स वै तिरोहितान् दृष्ट्वा महसा स्वेन दैत्यराट्।
सेन्द्रान्देवगणान् क्षीबानपश्यन् व्यनदद् भृशम्॥ २३
जब दैत्यराज हिरण्याक्षने देखा कि मेरे तेजके सामने बड़े-बड़े गर्वीले इन्द्रादि देवता भी छिप गये हैं, तब उन्हें अपने सामने न देखकर वह बार-बार भयंकर गर्जना करने लगा॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.17.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 319) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/17/23/